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प्रयागराज मेले में शंकराचार्य से जुड़ा एक और विवाद

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य विवाद:

आखिर क्यों आमने-सामने आए संत समाज और प्रशासन ?

प्रयागराज :- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। यह मामला अब सिर्फ धार्मिक नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बन चुका है। संत समाज, राज्य सरकार और अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं के चलते यह विवाद लगातार गहराता जा रहा है।

क्या है शंकराचार्य विवाद?

माघ मेले के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य कहे जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मौनी अमावस्या के पावन स्नान के दिन संगम तट तक पालकी द्वारा जाने से प्रशासन ने रोक दिया। इसी के बाद यह विवाद शुरू हुआ, जिसने देखते ही देखते तूल पकड़ लिया।
प्रशासन का कहना है कि भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा नियमों के चलते कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे जिनके चलते उन्हें पालकी की जगह अन्य लोगों की तरह पैदल जाने का अनुरोध किया गया था । जबकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थक पालकी से जाने की जिद पर अड़े थे। शंकराचार्य और उनके समर्थको का आरोप है कि यह एक धार्मिक गुरु का अपमान है।

शंकराचार्य पद को लेकर पुराना विवाद
दरअसल

यह विवाद केवल माघ मेले तक सीमित नहीं है। ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद को लेकर दशकों से कानूनी विवाद चल रहा है। प्रशासन का तर्क है कि इस पद को लेकर मामला कोर्ट में लंबित है और किसी को आधिकारिक रूप से शंकराचार्य घोषित नहीं किया गया है।
इसी आधार पर मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि वे किस अधिकार से “शंकराचार्य” की उपाधि का प्रयोग कर रहे हैं।

मौनी अमावस्या पर रोके जाने से भड़का मामला
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी प्रशासन ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद उन्होंने धरना शुरू कर दिया और प्रशासन पर धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का आरोप लगाया।
इस घटना के बाद प्रशासन की ओर से एक के बाद एक नोटिस जारी किए गए, जिससे संत समाज में नाराजगी और बढ़ गई।

राजनीति भी हुई सक्रिय
शंकराचार्य विवाद में राजनीति की एंट्री भी हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि यदि किसी संत का अपमान हुआ है तो इसकी जांच की जाएगी।
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए बयान दिया कि सनातन धर्म को कमजोर करने की कोशिश करने वाली शक्तियों से सतर्क रहने की जरूरत है।
वहीं आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने प्रशासन की कार्रवाई को अनुचित बताते हुए सरकार से माफी की मांग की है।

संत समाज में भी बंटा नजरिया
इस पूरे मामले में संत समाज भी एकमत नहीं दिख रहा है। कुछ संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं, जबकि कुछ संतों का कहना है कि प्रशासनिक नियमों का पालन सभी को करना चाहिए।

प्रशासन का पक्ष क्या है?
प्रशासन का साफ कहना है कि माघ मेले में कानून-व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। किसी भी व्यक्ति को नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा धार्मिक पद क्यों न रखता हो। साथ ही शंकराचार्य पद की वैधता को लेकर न्यायालय में मामला लंबित होने की बात भी प्रशासन दोहरा रहा है।

फिलहाल क्या है स्थिति?
फिलहाल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना जारी है और संत समाज के कई संगठन उनके समर्थन में उतर आए हैं। दूसरी ओर प्रशासन अपने फैसले पर कायम है। ऐसे में यह विवाद अब धार्मिक आस्था, प्रशासनिक अधिकार और कानून की व्याख्या के बीच फंसा हुआ नजर आ रहा है।

प्रयागराज माघ मेले में उठा शंकराचार्य विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। यह मामला केवल एक संत और प्रशासन के टकराव का नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं, संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप के संतुलन का भी है। अब सबकी निगाहें सरकार और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं कि इस विवाद का समाधान किस दिशा में जाता है।

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