
विश्विद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षा में समानता बढ़ाने और शिक्षण संस्थान में जाति आधारित भेदभाव कम करने के लिए नया कानून ” UGC समानता कानून ” लागू किया है जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में जाति, धर्म, लिंग, और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को जड़ से समाप्त करना है । यह नियम 13 जनवरी 2026 को प्रकाश में आया और 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हो चुका है ।
अभी तक क्या नियम थे:-
SC/ST और कमजोर वर्गों के शैक्षणिक हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून के अनुसार
SC/ST छात्र या शिक्षक को
अपमानित करना,जाति के नाम पर गाली,
मानसिक उत्पीड़न,संस्थागत भेदभाव को अपराध माना गया लेकिन इस कानून का सख्ती से पालन नहीं किया गया
विश्वविद्यालय इसे आंतरिक मामला बताकर टालते थे इसलिए यह कानून कमजोर माना गया
UGC ने विश्वविद्यालयों को कहा था:
SC/ST Cell बनाएं
शिकायत पेटी रखें
काउंसलिंग कराएं ,
लेकिन ये केवल Guidelines थीं, Regulation नहीं क्योंकि इनका
पालन न करने पर कोई सख़्त सज़ा का प्रावधान नहीं था ,जातिगत भेदभाव को अलग और संवेदनशील श्रेणी नहीं माना गया,अक्सर शिकायतें “Academic issue” बनाकर बंद कर दी जाती थीं
क्यों लाया गया कानून :-
Equal Opportunity Cells (EOCs) और SC/ST Cells के माध्यम से मिली सूचना के अनुसार
2019–20 से 2023–24 तक 704 विश्विद्यालयों और 1553 कॉलेजों से कुल 1160 मामले आए
( Source :- NewsGram)
इनमें वर्षवार मामले देखे जाएं तो
2019–20: 173
2020–21: 182
2021–22: 186
2022–23: 241
2023–24: 378
मामले आए , ये आंकड़े दिखाते हैं कि पांच वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें लगभग दोगुनी (118% +) हो गईं हैं।
(Source:- The Crossbill)
UGC के मुताबिक इस अवधि में लगभग 1,052 मामलों का समाधान (≈ 90.7%) किया गया, जबकि बचे हुए मामले (पेंडिंग) की संख्या भी बढ़ी है।
(Source:- NewsGram)
इसका मतलब है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़े मामले बढ़ रहे हैं, और इन पाँच वर्षों में लगभग 1,160 शिकायतें दर्ज की गईं हैं।
क्या कहता है नया ” UGC समानता कानून 2026 ” :-
हर संस्थान में एक समिति होगी जिसका अध्यक्ष संस्था प्रमुख या संस्था उपप्रमुख या प्रधानाचार्य होगा
भेदभाव रोकने और विद्यार्थियों के बीच सामाजिक समावेश बढ़ाने के लिए ” समान अवसर केंद्र” बनाए जायें
छात्रों की शिकायत के लिए चौबीस घंटे चलने वाली हेल्पलाइन और ऑनलाइन रिपोर्टिंग सिस्टम तैयार किए जाएं
शिक्षण संस्थान के परिसर में भेदभाव की घटनाओं पर निगरानी और उनकी पहचान करने के लिए विशेष दस्ता बनाया जाए
विरोध का कारण :-
इस कानून का विरोध करने वाले संगठन एवं संस्थाओं का मानना है कि इस नियम के दुरुपयोग की संभावना प्रबल है और झूठे मामलों में निर्दोष सामान्य वर्ग के छात्रों को फसाया जा सकता है
इस नियम का दुरुपयोग आपसी दुश्मनी के लिए किया जा सकता है
जाति आधारित इस प्रकार के नियम में यह पहली बार है कि इसमें SC, ST के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है जिसपर स्वर्णों का कहना है कि यह नियम एकतरफा है और समाज को बांटने का कार्य करेगा
इस नियम के अनुसार इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है जिस वजह से इस कानून पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे है
इस कानून का पालन न करने पर UGC से मिलने वाली फंडिंग रोकी जा सकती है जिससे बचने के लिए कोई भी संस्थान सामान्य वर्ग के खिलाफ की गई शिकायत पर कार्यवाही करेगा भले ही वह शिकायत झूठी हो ।
संस्थान को डिग्री प्रदान करने, ऑनलाइन प्रोग्राम चलाने से रोका जा सकता है या संस्थान की मान्यता भी रद्द की जा सकती है
“प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन 2026 ” के नियम 3C को असंवैधानिक, मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है । नियम 3C के अनुसार केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ संस्था में कोई भी भेदभाव, जाति आधारित भेदभाव माना जाएगा।
याचिका कर्ता का कहना है यह प्रावधान संविधान में दिए गए समानता, अभिव्यक्ति की आजादी , और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का हनन करता है








